shrimad bhagwatgeeta dwitiya adhyay jivandarshan

क्या पुत्र को पिता से बिजनेस में कम्पीटिशन करना चाहिये ? श्रीमद्भगवद्गीता – द्वितीय अध्याय

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श्रीमद्भगवद्गीता – द्वितीय अध्याय :- श्लोक 4 व 5 अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।2.4।। अर्थः- अर्जुन बोले – हे मधुसुदन मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य के विरूद्ध लडूंगा ? क्योंकि हे अरिसूदन ! वे दोनो ही पूजनीय है ।।2.4।। गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं […]

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अर्जुन रथ के पिछले भाग में क्यों चले गए ?

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अर्जुन रथ के पिछले भाग में क्यों चले गए ? अध्याय प्रथम का अंतिम श्लोक 47 सञ्जय उवाच एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।।47।। अर्थः-संजय बोले – युद्ध भूमि में शोक से उद्धिग्न मन वाले अर्जुन एस प्रकार कहकर,बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये ।   तात्पर्यः-अर्जुन […]

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Shrimadbhagwadgita

क्या अर्जुन का युद्ध करने से मना करने का निर्णय सही था ?

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क्या अर्जुन का युद्ध करने से मना करने का निर्णय सही था ? श्लोक 45 से 46 अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।।45।। अर्थः- हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गये है तथा राज्य सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए तैयार है । यदि […]

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सनातन कुलधर्म तथा जाति धर्म क्या है ?

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सनातन कुलधर्म तथा जाति धर्म क्या है ? श्लोक 43 से 44 दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।।43।। अर्थः- इन वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते है । उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।।44।। अर्थः- हे जनार्दन जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित […]

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Pitro ki mukti ke liye kya kare jivandarshan

पितरों की मुक्ति के लिए क्या करे ?

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श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय प्रथम श्लोक 41 से 42 पितरों की मुक्ति के लिए क्या करे ? अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः।।41।। अर्थः- हे कृष्ण पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती है तथा इससे वर्णसंकर संतान पैदा होती है सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां […]

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क्या प्राचीन परम्पराओं का पालन करना ही धर्म है ?

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श्लोक 40 क्या प्राचीन परम्पराओं का पालन करना ही धर्म है ? कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।। 40।। अर्थः- कुल का नाश होने से सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाता है तथा धर्म के नष्ट होने से सम्पूर्ण कुल में पाप फैल जाता है। तात्पर्यः- सनातन काल से अर्थात् प्राचीन काल सेसे […]

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टकराव की स्थिति में क्या समझदार व्यक्ति को भाग जाना चाहिए ?

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श्लोक 38 से 39 टकराव की स्थिति में क्या समझदार व्यक्ति को भाग जाना चाहिए ? यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।।38।। कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।39।। अर्थः- यघपि लोभ से भ्रष्टचित् हुए ये लोग अपने परिवार को मारने या अपने मित्रों से विरोध करने में कोई दोष नहीं देखते […]

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क्या अर्जुन के मन में पक्षपात करने की भावना थी ?

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अध्याय प्रथम श्लोक 36 से 37 क्या अर्जुन के मन में पक्षपात करने की भावना थी ? निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।।36।। अर्थः- हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रो को मारने पर हमें थोड़ीसी भी प्रसन्नता नहीं होगी बल्कि इन आततायियो को मारने से हमें पाप लगेगा। तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं […]

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क्या अहिंसा का पालन सबको करना चाहिये ?

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अध्याय प्रथम श्लोक 35 क्या अहिंसा का पालन सबको करना चाहिये ? एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते।।35।। अर्थः- हे मधुसुदन ये मुझको ही मार डाले परन्तु उनकी हत्या का विचार मन में न लाऊ। चाहे मुझे तीनों लोंको का राज्य भी क्यों न मिले तो भी इनको नहीं मारना चाहता। […]

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अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था ?

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अध्याय प्रथम श्लोक 33 से 34 अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था ? येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।।33।। अर्थः- हमें जिनके लिए राराज्य भोग एवं सुख की इच्छा है वे सभी युद्ध में प्राण देने के लिए तैयार खड़े है। आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः […]

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krishna arjun jivandarshan

मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूं ऐसा अर्जुन ने क्यों कहां ?

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अध्याय प्रथम श्लोक 31 से 32 मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूं ऐसा अर्जुन ने क्यों कहां ? निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।31।। अर्थः- हे केशव युद्ध में अपने ही लोगो को मारनेमारने में मुझे कोइ कल्याण नहीं दिखता मेहैं मुझे अच्छे शकुन नहीं हो रहे […]

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युद्ध में अर्जुन कांपने लगा तथा उसके हाथ से धनुष भी गिर गया क्यों ?

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अध्याय प्रथम श्लोक 27 के उत्तरार्ध से श्लोक 30 तक युद्ध में अर्जुन कांपने लगा तथा उसके हाथ से धनुष भी गिर गया क्यों ? तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ।।27।। कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। ।।28 वे का पूर्वार्ध।। अर्थः- वहॉ उपस्थित सम्पूर्ण रिश्तेदार बन्धुओ को देखकर अत्यन्त करूणा से भरकर शोकशोकाकुल होकर अर्जुन बोले । अर्जुन […]

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