shrimad bhagwat gita adhyay 2 shlok 8,9

क्या अर्जुन के मन में उठता वैराग्य भाव झुठ था ?

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श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय द्वितीय – श्लोक 8 व 9 श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय द्वितीय – श्लोक 8 व 9न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।।2.8।।अर्थः- भुमि में निष्कण्टक,धन धान्य सम्पन्न राज्य को तथा देवताओं के स्वीमीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस साधन को नहीं देखता हूँ जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले शोक को दुर […]

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क्या उधार मांगना सही है ?

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दोस्तों वैसे आप उधार शब्द से बहुत अच्छे से वाकिफ होंगे…लोगो की आम बोलचाल की भाषा में इस शब्द का प्रयोग होता है…और साथ ही हर कोई किसी ना किसी से उधार जरूर मांगता है…उधार के भी बहुत से अलग-अलग प्रकार है…. दोस्तों उधार मांगने का ये मतलब कतई ना निकाले की हमने किसी से […]

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guru tatav kya hai jivandarshan

गुरूतत्व क्या है ?

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श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय द्वितीय-श्लोक 7 श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय द्वितीय-श्लोक 7कार्पण्यदोषोपहतस्वभावःपृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मेशिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।अर्थः- इसलिये कायरतारूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा ध्रम के विषय में मोहचित हुआ मैं आपसे पुछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो,वह मेरे लिए कहिये। क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये […]

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shrimad bhagwatgeeta adhyay 2 shlok 6 jivandarshan

क्या आपको कभी अर्जुन की तरह असमंजस का सामना करना पड़ा है ?

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श्रीमद्भगवद्गीता – द्वितीय अध्याय – श्लोक 6 न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।2.6।। अर्थः- हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना इन दोनों में से कौन सा श्रेष्ठ है अथवा यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे या […]

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shrimad bhagwatgeeta dwitiya adhyay jivandarshan

क्या पुत्र को पिता से बिजनेस में कम्पीटिशन करना चाहिये ? श्रीमद्भगवद्गीता – द्वितीय अध्याय

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श्रीमद्भगवद्गीता – द्वितीय अध्याय :- श्लोक 4 व 5 अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।2.4।। अर्थः- अर्जुन बोले – हे मधुसुदन मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य के विरूद्ध लडूंगा ? क्योंकि हे अरिसूदन ! वे दोनो ही पूजनीय है ।।2.4।। गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं […]

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Fear of childhood jivandarshan.com

बचपन का ‘डर’

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डर जो हमेशा हमे डराते है दोस्तों मेरा आज का पोइंट है “बचपन का डर” वैसे इस बिन्दु पर भी कोई गौर नहीं करता है पर ये बात हमारे बच्चों पर ओर उनके बड़ा हो जाने के बाद भी असर करती है… दोस्तों जब हम छोटे होते है तब हमारे माता-पिता या कोई भी रिश्तेदार […]

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shrimad bhagwadgeeta adhyay dwithiya shlok 1 to 3 jivandarshan

अपने कर्तव्य का पालन निष्ठा से करें ।

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श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय द्वितीय सञ्जय उवाचः- तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।2.1।। अर्थः- संजय बोले – उस प्रकार करूणा से व्याप्त और ऑसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रो वाले शोक युक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसुदन ने यह वचन कहा ।।2.1।। श्री भगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।2.2।। अर्थः- श्री भगवान बोले- हे अर्जुन […]

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