अध्याय प्रथमश्रीमद् भगवद्गीता

क्या प्राचीन परम्पराओं का पालन करना ही धर्म है ?

श्लोक 40
क्या प्राचीन परम्पराओं का पालन करना ही धर्म है ?
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।। 40।।

अर्थः- कुल का नाश होने से सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाता है तथा धर्म के नष्ट होने से सम्पूर्ण कुल में पाप फैल जाता है।
बलदेव रावल
तात्पर्यः- सनातन काल से अर्थात् प्राचीन काल सेसे अनेक नियम तथा परम्परायें पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रहीं है परिवार में जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त अनेको संस्कारों व परम्पराओं को घर के वयोवृद्ध अर्थात् बड़े निभाते है तथा संस्कारो का ज्ञान घर के बड़े ही अपने से छोटो को देते है।
परिवार में प्राचीनकाल से चली आ रही कुल की शुभ व श्रेष्ठ परम्पराये होती है जिसके कारण बच्चों में संस्कार पड़ता है तथा सदाचार का पाठ बच्चें सीखते है यदि युद्ध हुआ तो वयोवृद्ध समाप्त हो जाएंगे तथा शेष बच्चों व स्त्रियों में परम्पराओं को नहीं जानने के कारण अधर्म फैल जायेगा क्योंकि इनकों सदाचार का पाठ पढ़ाने वाले जिन्दा नहीं रहेंगे।
एक ही गोत्र में उत्पन्न लोग एक दुसरे पर आक्रमण करेंगे तथा अपने ही कुल के लोगो को मारने से महापाप होगा तथा इस महापाप के कारण पुरे कुल में अधर्म फैल जायेगा। अतः अर्जुन अपने तर्क द्वारा कृष्ण को युद्ध नहीं करने के अपने विचार को सही साबित करने का प्रयत्न कर रहे है।
हम लोग भी बहुत सी प्राचीन परम्पराओं का पालन करते रहते है तथा उन परम्पराओं के पालन को ही धर्म समझते है तथा ऐसा मानते है कि जो इन परम्पराओं का पालन नहीं करता वह धार्मिक नही है । जो भी व्यक्ति प्राचीन रूढ़ी व परम्पराओं का पालन करता है उसे धार्मिक मान लेते है। जबकि सत्य यह नहीं है।




आज का पढ़ा लिखा व्यक्ति यदि रूढ़ीवादी परम्पराओ को मानने से इन्कार करता है तो हम इसे नास्तिक या अधर्मी करार देते है क। परम्पराए अच्छी भी होती है तथा बुरी भी इसलिए बुरी परम्पराओं को तोड़ने का कार्य संतो ने अंधविश्वास एवं रूढ़ीवादिता पर प्रहार कर उन्हें दुर करने का प्रयत्न किया तथा व्यक्ति को आध्यात्मिक बनने की प्रेरणा दी तथा सही मार्ग दिखाया।
परन्तु लोगो का विरोध संतो को भी झेलना पड़ा उन्हे लोगो द्वारा प्रताड़ित भी किया गया परन्तु संत हमेशा सत्य का मार्ग दिखाते रहे ।

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