Antar aatma in hindi

क्या परमात्मा हमसे पाप करवाता है ? (Antar aatma in hindi)

क्या अंतर आत्मा में बैठा परमात्मा करवाता है पाप ?(Antar aatma in hindi)

Antar aatma in hindi- महाभारत में दुर्योधन कहता है कि मैं धर्म को जानता हूं परन्तु मैं धर्म के अनुकुल जीवन नहीं जी सकता । मैं अधर्म को भी समझता हूं परन्तु पाप कर्म को छोड़ नहीं सकता।

मेरे अंदर जो बैठा है वहीं पाप-पुण्य करवाता है । अर्थात मेरे अंदर परमात्मा बैठा है वहीं मुझे पुण्य करने नहीं देता तथा पापकर्म करने को प्रेरित करता है।

आप सभी के मन में भी यह बात कभी ना कभी उठती होगी की सभी के अंदर परमात्मा विघमान है फिर भी व्यक्ति पाप कर्म क्यों करता है तथा अंदर बैठा परमात्मा ही अच्छे बुरे कर्म के लिए जिम्मेदार है ?

कई धर्मो में पाप कर्म करवाने वाले को शैतान कहां,उनकें धर्म ग्रन्थों में लिखा कि शैतान व्यक्ति को बरगला कर गलत रास्तों पर ले जाता है।

परन्तु हम तो ये मानते है कि प्रत्येक में परमात्मा का ही निवास है परमात्मा सदैव सत्कर्म ही करवाता है । तथा हममें जो जन्मों-जन्मो के संस्कार है वहीं हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करते है।

अनेक जन्मों के हमारे से जुड़े खराब संस्कार है वह पाप करनाते है हमारी अंतर आत्मा हमें सावधान भी करती है कि यह काम गलत है उसे न करों

परन्तु मनुष्य अंतर आत्मा की बात को अनसुना करके खराब संस्कार वश बुरे कर्म करने लग जाता है ।

यदि व्यक्ति में अच्छे संस्कार है तो बुरा कर्म करते-करते व्यक्ति अपनी अंतरआत्मा की बात मान लेगा तथा बुरे कर्म से बचेगा।

कर्मों का फल व्यक्ति को निश्चित भोगना पड़ता है ।

यदि आप प्रभु के नाम का सुमिरन करोगे तथा अंतरआत्मा की आवाज के सहारे चलोगे तो धीरे-धीरे बुरे संस्कारों का मिटना प्रारम्भ हो जाता है तथा पुण्य बढ़ने लगता है तथा व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होने लगती है ।

इतिहास तथा शास्त्र प्रमाण है कि अंगुलिमान जैसे डाकु तथा वाल्मीकि ने परमात्मा के नाम का सहारा लेकर अपने बुरे संस्कारों की बैड़िया काट डाली तथा उनके नाम अमर हो गये तथा आज भी हम उनकों याद करते है।

हमारे द्वारा जितने भी पुण्य कार्य होते है वह हममें बैठा परमात्मा करवाता है परन्तु गलत कार्य परमात्मा नहीं करवाता बल्कि हमारे संस्कार करवाते है। प्रभुनाम के सुमिरन से पाप संस्कार कटते है।

Antar aatma in hindi

विघारण्य स्वामी ने आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए गायत्री मंत्र के चौबीस पुरश्चरण किये।

लेकिन उन्हे कोई सफलता नहीं मिली थककर उन्होंने जैसे ही सन्यास ग्रहण किया गायत्री माता प्रकट हुई तथा वरदान मांगने को कहां ।

जब स्वामी जीने गायत्री माता से कहां कि मैंने अर्थ प्राप्ति के लिए चौबीस पुरश्चरण किये परन्तु आप प्रकट नहीं हुई जबकि मैंने सन्यास ले लिया है तब आप प्रगट हुई अब मुझे अर्थ कि आवश्यकता नहीं है।

तो गायत्री माता ने कहां पीछे देखो तो विघारण्य स्वामी ने चौबीस पहाड़ जलते देखे तब गायत्री माता ने कहां तेरे चौबीस पुरश्चरण करने से तेरे जन्मों जन्मों के पाप समाप्त हुए तथा जैसे ही तुमने वैराग्य धारण किया

तुम्हारे सारे पाप समाप्त हो गये तथा पुण्य का पलड़ा भारी हो गया तथा मैं प्रकट हो गई।

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हमारे द्वारा लिया प्रभु का नाम कभी खाली नहीं जाता यदि हमें प्रभु का नाम जपने पर सफलता नहीं मिलती तो हमें मानना है कि पाप संस्कार नष्ट हो रहे है तथा जैसे ही पाप संस्कार नष्ट हो जायेंगे।

हमारे ऊपर परमात्मा की कृपा हो जायेगी ।

यदि हम अच्छे कर्म नहीं करेंगे तथा पाप कर्म ही करते जायेंगे तो हम कभी भी परमात्मा की कृपा प्राप्त नहीं कर पायेंगे। हमारी मुक्ति होनी संभव नहीं है।

दैवीय पुरुषों को भी अपने कर्म का फल भुगतना पड़ा है तो हमारी औकात क्या है ?
बलदेव रावल
अस्तु श्री शुभम्

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