Bhitri yatra ki sadhna kaise kare by jivandarshan

भीतर की यात्रा : कैसे करे (Bhitri yatra ki sadhna kaise kare)

Bhitri yatra ki sadhna kaise kare-ॐ गुरवे नमः…..आपको पिछली पोस्ट में भीतर की यात्रा से जुड़े पहलुओ तक ले गए और बात समाप्त कर दी….आज वही से अपनी बात शुरू करेगे…..

आपसे स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर पर चर्चा की….स्थूल शरीर यानि चेतन, सूक्ष्म शरीर यानि अवचेतन और कारण शरीर यानि अचेतन शरीर ..आध्यात्म की भाषा में शरीर मन और आत्मा……थोडा से रुक कर आपसे अनुरोध करना चाहुगा…..

इस पोस्ट पर पूरा ध्यान दे…..यह हमारे जीवन पथ को आनंद से भरने वाली है……

हमारा शरीर ज्यादातर बाहर की वृतियो पर निर्भर रहता है……दुसरो से तुलना, इसके बाद सुख-दुःख, दुखी और परेशान होना, हम आनंद पथ को भूल जाते है और सुख को ही आनंद समझने की भूल करते है…..

पर सुख तो एक भाव है….यह आया है तो जाना भी है और जब जाएगा तो दुःख देगा…..यानि भाव अवस्था है…. इसी तरह क्रोध का आलम है….पहले क्रोध आता है बाद में पश्चाताप …..

यह सारी अवस्था पैंडुलम सी है….इनका आना और जाना चलता ही रहेगा….

नवजीवन के आनंद की साधना ( Navjivan ke anand ki sadhna hindi)

यह सब इसलिए होता है की हमारी सारी उम्मीदों के सूत्र बाहर से ही होते है…..और वो भी तुलना से…..आप देखे हमारे दर्द, दुःख सुख सब के कारण बाहर से ही है…..

अब आपका सवाल होगा की इसका समाधान किया है……जानने की आतुरता भी बहुत बढ़ गई होगी….यही सब चल रहा है ना…..यह भी बाहर का ही भाव है……

हमें लगा की शोर्ट कट में जीवन आनंद का पथ मिल रहा है…..आप इन्ही भावो के साथ कई साधना शिविर से भी जुड़े होगे ….जब वहा रहे और वहा से आने के कुछ दिनों तक ठीक लगा….

बाद में सब पहले जैसा हो गया….ऐसे में गुरु बदले….

मार्गदर्शक बदले और बदलते ही जा रहे है……आपने साधना भी की होगी….पर मन में आया विचार रोका तो हजार नए आ गए…..अब आप अपने को देखे …..विचार बाहर से आ रहे थे…..और जो हम चाहते थे ….

Bhitri yatra ki sadhna kaise kare

उसके विरोध वाले विचार ही ज्यादा चलते थे….चुकि हम भीतर तो जुड़ ही नहीं रहे है…..तो आनंद पथ पर चल कैसे पायेगे…..

यह सब स्थूल शरीर का बाहर से जुड़ाव था…..अब सूक्ष्म शरीर यानि मन को थोडा समझे……यह आपको भावो के अनुरूप गतिमान रहेगा…..

आप इसको बाहर से खुराक दे रहे हो तो वो बगैर किसी टोकाटोकी के न्यूटल रहते हुए आपको भावो के अनुरूप आपकी हां में हां मिलाते हुए चुपचाप चलता रहेगा……

अवचेतन यानि मन कभी भी आपको कोई सुझाव नहीं देगा…..वो तो आपके हर भाव का समर्थन ही करेगा…..

अब थोडा सा कारण शरीर यानि अचेतन यानि अपनी आत्मा को समझे….आप एक बार अपने सारे कामों पर नजर डाले….जब आप गलत पथ पर होते है…..नकारात्मक सोचते है…..

दुसरो की निंदा करते है…..सम्पति के लिए गलत पथ पर बढ़ते है…….बिमारी का दर्द जीते है……यानि जब गलत काम करते है……एक पल के लिए आपके भीतर से एक आवाज आती है…..यह ठीक नहीं है….

पर हम इसको अनसुना करके अपने हाल में मस्त हो जाते है……बस यही छोटा सा संकेत था…..इसी को समझना था और इसी को समझना है…….बस यही ध्यान की जरुरत है…..

यही साधना पथ का पहला कदम होगा…….आप jivandarshan.com के आनंद ध्यान अमृत की अन्य पोस्ट भी देखे……आपको बीमारियों और उनके केन्द्र और निदान को भी बतायेगे…….

साधना कैसे करनी है…..लगातार कैसे हम अपने कारण शरीर से जुड़े रहे….इन सब को समझना ही साधना है……

धन्यवाद

दिव्यराज दीपक

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